बजे नगाड़े बरसे मोती
आसमान में बजे नगाड़े या बुढ़िया दलती सिंघाड़े! या फिर भूरे-काले बादल बड़े जोर से पढ़े पहाड़े! झर-झर बूँदें बरसे मोती बुढ़िया अपनी चकिया धोती या फिर कोई छोटी बदली फज़ा में पिट कर है रोती!
-पद्मा चौगांवकर (1942)
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