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छिप-छिप कर
खाते हैं
हमसे
लड्डू
मोती चूर
के
लम्बी-मोटी
मूँछें
ऍंठे
सोने की
कुर्सी पर
बैठे
धूल-धूसरित
लगते उनको
हम बच्चे
मज़दूर के
चन्दा
मामा दूर
के।
बातें
करते
लम्बी-चौड़ी
कभी न देते
फूटी कौड़ी
डाँट
पिलाते
रहते
अक्सर
हमको बिना
कसूर के
चन्दा
मामा दूर
के।
मोटा पेट
सेठ का
बाना
खा जाते हम
सबका खाना
फुटपाथों
पर हमें
सुलाकर
तकते रहते
घूर के
चन्दा
मामा दूर
के।
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