दादाजी की चोटी
दादा जी की चोटी कितनी लम्बी-मोटी यह घुटनों तक जाती है नागिन सी लहराती है फिर भी कहती रहती है मैं हूँ कितनी छोटी ! इसका है तेली से मेल यह पीती है नौ मन तेल मगर नहीं बुझती है प्यास इसकी नीयत खोटी दादा जी की चोटी !
-शिव गौड़ (1955)
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