बालगीत

 दादाजी की चोटी

दादा जी की चोटी
कितनी लम्बी-मोटी
यह घुटनों तक जाती है
नागिन सी लहराती है
फिर भी कहती रहती है
मैं हूँ कितनी छोटी !
इसका है तेली से मेल
यह पीती है नौ मन तेल
मगर नहीं बुझती है प्यास
इसकी नीयत खोटी
दादा जी की चोटी !

-शिव गौड़
(1955)

 

संस्थापक व संपादकः डा जगदीश व्योम             वेब सहयोगः पूर्णिमा वर्मन


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