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धूप
खिली है!
मम्मी
देखो सूरज
निकला
कई दिनों
में धूप
खिली है
घुमड़-घुमड़
कर काले
बादल
बारिश कर
जाते थे झर-झर
हम कोनों
में छिप
जाते थे
आंधी
बिजली से
डर-डर कर
जाने कैसे
आज अचानक
थोड़ी
राहत हमें
मिली है।
इक्का
दुक्का
बादल अब भी
घूम रहे
हैं आसमान
में
कभी अचानक
मिल जाते
हैं
बातें
करते कान-कान
में
सैर सपाटा
करने को
फिर
चिड़ियों
की टोली
निकली है।
मम्मी,
पापा जी से
कह दो
संभल-संभल
कर जाएं
दफ्तर
कपड़े
गंदे हो
सकते हैं
छींटे आ
जाते हैं
उड़कर
नीली पैंट
न हरगिज़
पहनें
कुछ दिन
पहले नई
सिली है।
-योगेन्द्र
कुमार
लल्ला
(1937)
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