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सच्चा
दानी
पेड़ किसी
से नहीं
पूछता
कहो, कहाँ
से आए ?
वह तो बस कर
देता छाया
चाहे जो
सुस्ताए!
खिलते समय
न फूल
सोचता
कौन उसे
पाएगा?
उसकी
खुशबू
अपनी
सांसों
में
भर
इतराएगा!
बादल से जब
सहा न जाता
अपने जल का
संचय
बस, वह बरस-बरस
भर देता
नदियाँ,
नहर, जलाशय!
जो स्वभाव
से ही दाता
है
उन्हें न
कोई भ्रम
है
भेदभाव
करते हैं
वे ही
जिनकी
पूजा कम
है।
-बालस्वरुप
राही
(1936)
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