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सूरजजी !
तुम इतनी
जल्दी
क्यों आ
जाते हो ?
लगता तुमको नींद न आती
और न कोई काम तुम्हें
ज़रा नहीं भाता क्या मेरा
बिस्तर पर आराम तुम्हें
ख़ुद तो जल्दी उठते ही हो‚
मुझे उठाते हो!
सूरज जी!!
कब सोते हो‚
कब उठ जाते
कहाँ
नहाते-धोते
हो?
तुम तैयार
बताओ हमको
कैसे झटपट
होते हो?
लाते नहीं
टिफ़िन‚
क्या खाना
खा कर आते
हो?
सूरज जी!!
रविवार आफ़िस बन्द रहता
मंगल को बाज़ार भी
कभी-कभी छुट्टी कर लेता
पापा का अख़बार भी
ये क्या बात‚
तुम्हीं बस छुट्टी
नहीं मनाते हो!
सूरज जी!!
-कृष्ण शलभ
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