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मैं
झाँसी,
दुश्मन के
मंसूबों
की फाँसी,
मैं
ज्योति
वीरता के
ज्वलन्त
आदशों की।
स्वातंत्र्य
हेतु
तलवार सान
पर चढ़ी
हुई,
जीवंत
प्रेरणा
मैं भीषण
संघर्षों
की।
मेरी
मिट्टी
में
बारूदी
विस्फोट
सजग,
हर कंकड़
है मेरा,
बलिदान-कहानी
है।
हर पत्थर
है बेजोड़
वीरता का
स्मारक,
मैं वह,
जिसमें
पर्याय आग,
का पानी
है।
मैं वह,
जिसकी
बरजोर
हवाओं में
बिजली,
जिसकी हर
पत्ती के
हैं तेवर
तने हुए।
जिससे
टकरा कर
मौत स्वयं
मुँह की
खाए,
मेरे बेटे
हैं उसी
धातु के
बने हुए।
तलवार हाथ
में लिए
बुन्देला
टूट पड़े,
दुश्मन
पर्वत भी
हो तो वह हट
जाएगा।
वह टूट
जायगा
किन्तु
झुकेगा
नहीं कभी,
धरती के
हित वह
खड़ा-खड़ा
कट जाएगा।
यदि नाम
पूछना हो
मेरा, तो
सुनो पथिक!
लन्दन
वालों से
पूछो, वे
बतलाएँगें।
झाँसी
कहने के
पहले थर-थर
काँपेंगे,
लेते ही
मेरा नाम,
घाव
हरियायेंगे।
जब डींग
मारते हों
वे कभी
वीरता की,
ले दो
झाँसी का
नाम,
मुर्दनी
छाएगी।
वे भले भूल
जाएँ अपने
राजा-रानी,
झाँसी की
रानी नहीं
भुलाई
जाएगी।
मैं झाँसी,
मेरा नाम
स्वयं
इतिहास एक,
अक्षर-अक्षर
बलिदान
कहानी
कहता है।
जब कभी देश
का मान
दाँव पर
लगता है,
मेरा
विद्रोही
खून नहीं
चुप रहता
है।
मेरी
मिट्टी के
आगे सोना
मिट्टी है,
मेरी
मिट्टी, हर
देश-भक्त
को चन्दन
है।
हर कण
सजीवता की
जीवित
परिभाषा
है,
हर क्षण
जीवन का
सर्वोपरि
अभिनंदन
है।
जिनके
अंतर में
देश-भक्ति
की अमर
ज्योति
वे दीवाने,
मेरे
दर्शन को
आते हैं।
उनकी
भावुकता
मेरे लिए
समस्या है,
मेरी
मिट्टी, वे
अपने शीष
चढ़ाते
हैं।
आया था ऐसा
ही दीवाना
एक कभी,
शायद उसने
कुछ आक-धतूरा
खाया था।
सब लोग
माँगते
सुखी,
दीर्घ
अच्छा
जीवन,
वह मुझसे
अच्छी मौत
माँगने
आया था।
बोला, माँ!
दे सकती हो
तो यह वर दे-दे,
आजादी के
तेरे सपने
साकार
करूँ।
आलेख
प्रेरणा
की जो रहे
पीढ़ियों
को,
जो मरदों
को जीवन दे,
ऐसी मौत
मरूँ।
रह गई
स्तब्ध, जब
मैंने
उसकी माँग
सुनी,
`हाँ या ना'
इनमें से
कुछ भी
कैसे
कहती।
जिसने
मुझको माँ
कह, मेरी पद-रज
ली थी।
माँ बनकर
उसकी मौत
भला कैसे
सहती।
`ना' भी
इसलिए
नहीं मेरे
मुँह से
निकला,
युग-ध्वनि
उसकी वाणी
में मुझे
सुनाई दी।
आजादी की
तस्वीर
गढ़ी थी जो
मैंने,
उसके
संकल्पों
में मुझको
दिखलाई
दी।
मैं इतना
ही कह सकी
यशस्वी
रहो वत्स!
तेरा जीवन,
मेरे
सपनों की
गोद पले।
क्या कहूँ
मौत की मौत
नहीं, वह
जीवन हो,
तेरे
इच्छा-पथ
पर वह सहमी
हुई चले।
-०००-
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