चन्द्र शेखर आजाद महाकाव्य
–श्री कृष्ण सरल

अध्याय-१८ चाँदनी और चट्टान-द्वीप

उस दिन जब निकला चाँद, चाँदनी भी निकली,
वह तेज नशे की हलकी हुई खुमारी सी।
रेशमी-धवल साड़ी में धरा सुशोभित थी,
अवगुण्ठित स्नेहिल विनय-शील सुकुमारी-सी।

चाँदनी, कि जैसे कुशल चाँद जादूगर ने,
दर्शक-दल पर अपनी मोहनी बिखेरी हो।
या किरण-जाल फैला धरती को फाँस लिया,
नभ के मचान पर बैठा चाँद अहेरी हो।

चाँदनी, धरा पर दूती बन कर आई-सी,
वह चाँद, प्रतीक्षा-रत जैसे अभिसारी हो।
या जिसका मुँह फक हुआ जमा-पूँजी खोकर,
वह चाँद, कि जैसे हारा हुआ जुआरी हो।

चाँदनी, कि जैसे उजली कीर्ति कलाधर की,
दिशि-विदिशाओं में सुमन-सुरभि-सी फैली थी
वह चाँद, सुकवि जैसे रहस्यवादी कोई,
चाँदनी, कि, जैसे उसकी अपनी शैली थी।

वह चाँद, फुहारों का हो जैसे छतनारा,
धरती जैसे जी-भर मल-मल कर नहा रही।
चाँदनी, कि जैसे स्वच्छ झाग हो साबुन का,
या नभ की ग्वालिन दूध धरा पर बहा रही।

मैं स्नात आगरा रूप-रंग-रस धारा में,
स्वप्निल कल्पना-तरंगों में लहराया-सा।
राका रजनी की रजत-रश्मियों से कर्षित,
था ताज-क्षेत्र में जन-जीवन बौराया सा।

कुछ यहाँ-वहाँ बैठे थे बिखरे-बिखरे से,
गपशप करते मुकुलित सुरभित उद्यानों में।
मखमली गलीचे जैसा हरित दूर्बा-दल,
मृदु सिहरन भरता यौवन के अरमानों में।

थी होड़ लगी, कुछ सुमन उधर, कुछ सुमन इधर,
सौरभ-तंरग थी प्रसरित बहु-धाराओं में।
कुछ भ्रमर उधर बन्दी थे सरसिज-संपुट में,
मन हुए इधर बन्दी, तन की काराओं में।

चाँदनी स्निग्ध-शीतल थी चन्दन जैसी, पर,
बाजार गर्म था विविध भाव-अनुभावों का।
थी कहीं उपालंभित प्रेमी की निष्ठुरता,
हो रहा प्रदर्शन कहीं हृदय के घावों का।

था मान-मनौवल कहीं, कहीं वादों की झड़,
थी कहीं दुहाई दी जाती विश्वासों की।
मीठे सपनों को सरसाती स्वर छेड़ रही,
बाँसुरी कहीं मादक श्वासों-प्रश्वासों की।

लगता, जैसे जीवन केवल वैभव-विलास,
लगता, जैसे दुनिया केवल रस की धारा।
लगता जैसे सौन्दर्य चक्रवर्ती शासक,
लगता था, जैसे कोमल रूप कठिन कारा।

मनुहार-प्यार के इस अगाध सागर में ही,
संकल्प प्रखर भी थी कुछ बड़वानल जैसे।
उठ रहा झाग फुसफुसा धरातल पर केवल,
भूकम्प छिपाए हुए अतल का जल जैसे।

आनन्द महासागर में दो चट्टान-द्वीप,
कर रहे धरातल की गतियों का अनुशीलन।
उनके कठोर संकल्पों में विस्फोट सजग,
वे क्या जाने मन की कलियों का उन्मीलन।

प्रतिमान द्वीप द्वय थे नगराज हिमालय के,
उपलब्धि एक की तन-मन की उँचाई थी।
संगठित, पुष्ट पौरुष की घनीभूत गरिमा,
जो द्वीप दूसरा था, वह उसने पाई थी।

यदि नामकरण अत्यावश्यक हो, तो कह दूँ,
था भगतसिंह, पौरुष पंजाबी पानी का।
आजाद, नाम था फौलादी संकल्पों का,
वह चरम बिन्दु था तपती हुई जवानी का।

ज्योत्सना-सरोवर में वे कमल-पत्र जैसे,
मन तो क्या तन पर भी न बूँद क्षण भर ठहरी।
रस की रुचि ऐसी, जैसे पानी की लकीर,
कर्त्तव्य-सजगता पत्थर की रेखा गहरी।

आजाद फुसफुसाया, ``क्या बुरा जमाना है,
अभिशाप गुलामी का साँसों पर छाया है।
यह यौवन है जो पिघल रहा शीतलता से,
यह जीवन का आनन्द लूटने आया है।

मन में आता है, अगर चले मेरा वश तो,
वैभव-विलास के घर में आग लगा दूँ मैं।
सम्मान बेच, सुख-नींद सो रहा जो समाज,
जी करता, उसकी ठोकर मार जगा दूँ मैं।

प्रतिरोध न करता जो यौवन अन्यायों का,
जिस लाल खून में नहीं आग की गर्मी है।
जिन साँसों में है लपटों जैसी लहक नहीं,
जिन्दगी, जिन्दगी नहीं, बड़ी बेशर्मी है।

सहमति सूचक `हाँ' भगतसिंह के स्वर में थी,
उद्दाम मनोभावों का किया समर्थन था।
उसके चिन्तन को तर्क सदा बनते खराद,
इसलिए विनत हो प्रस्तुत यह संशोधन था।

क्यों आग लगाएँ हम अपने समाज में ही,
हम लोग गुलामी की ही चिता सजाएँगे।
जिसने हमको अपने घर में घर-हीन किया,
उसकी इंर्टों से अब हम ईंट बजाएँगे।

आजादी अपना मूल्य माँगती है हमसे,
हम अपने मीठे सपनों का बलिदान करें।
जिसकी मिट्टी की गंध समाई साँसों में,
जीवन देकर, उस धरती का सम्मान करें।

उल्टी-सीधी, सीधी-उल्टी इसकी गति हैं,
यह व्यक्ति-देश का भाग्य-चक्र ऐसे फिरता।
मर-मिंटे व्यक्ति, तो देश सँवरता है उनका,
यदि व्यक्ति सँवरते, देश बहुत नीचे गिरता।

इसलिए करें संकल्प, नींव के पत्थर बन,
छाती पर आजादी का महल उठायेंगे।
हम नींव खून से जितनी-जितनी सींचेगे,
उस मंजिल पर हम उतने शिखर चढ़ाएंगे।

आजाद तड़प कर बोल उठा, `सुन भगतसिंह!
यह खून देश का है, यह मेरा खून नहीं।
जो मेरे संकल्पों की गति को रोक सके,
इस शासन पर ऐसा कोई कानून नहीं।

मैं प्रलय-मेघ-सा शासन पर मंडराऊँगा,
मैं आजादी का पावन कमल खिलाऊँगा।
प्यासी धरती को लोग पिलाते पानी, मैं-
अपनी धरती को अपना खून पिलाऊँगा।

मैं रक्त तिलक कर, वचन दे रहा हूँ तुझको,
लोहित लहरों में तेरे साथ बहूँगा मैं।
जब खूनी तूफानों में कूद पडेग़ा तू,
उस तैराकी में पीछे नहीं रहूँगा मैं।
-०००-

 

संस्थापक व संपादकः डा जगदीश व्योम             वेब सहयोगः पूर्णिमा वर्मन


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