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कौन
कहता है कि
हम हैं
सरफिरे,
खूनी,
लुटेरे?
कौन यह जो
कापुस्र्ष
कह कर हमें
धिक्कारता
हैं?
कौन यह जो
गालियों
की
भर्त्सना
भरपेट
करके,
गोलियों
से तेज,
हमको
गालियों
से मारता
है।
जिन
शिराओं
में उबलता
खून यौवन
का हठीला,
शान्ति का
ठण्डा जहर
यह कौन
उनमें भर
रहा है?
मुक्ति की
समरस्थली
में, मारने-मरने
चले हम,
कौन यह
हिंसा-अहिंसा
का विवेचन
कर रहा हैं?
कौन तुम?
तुम पूज्य-पूज्य
बापू?राष्ट्र-अधिनायक
हमारे,
तुम
बहिष्कृत
कर रहे, ये
क्रान्तिकारी
योजनाएँ?
आत्म-उत्सर्जन
करें,
स्वाधीनता
हित हम शलभ-से,
और तुम
कहते,
घृणित हैं
ये सभी
हिंसक
विधाएँ।
तो सुनो
युगदेव! यह
मैं
चन्द्रशेखर
कह रहा हूँ,
सत्य ही
खूनी,
लुटेरे और
हम सब
सरफिरे
हैं।
दासता के
घृणित
बादल छा गए
जब से धरा
पर,
हम उड़ाने
को उन्हें
बनकर
प्रभंजन आ
घिरे हैं।
सत्य ही
खूनी कि
हमको खून
के पथ का
भरोसा,
खून के पथ
पर सदा
स्वाधीनता
का रथ चला
है।
युद्ध के
भीषण
कगारे पर
अहिंसा
भीस्र्ता
है,
मुक्ति के
प्यासे
मृगों को
इन भुलावे
ने छला
हैं।
हड्डियों
का खाद
देकर खून
से सींचा
जिसे हैं,
मुक्ति की
वह फसल,
मौसम के
प्रहरों
में टिकी
हैं।
प्रार्थनाओं-याचनाओं
ने संवारा
जिस फसल को,
वह सदा
काटी गई,
लूटी गई
सस्ती
बिकी है।
प्रार्थनाओं-याचनाओं
से अगर
बचती
प्रतिष्ठा,
गजनवी
महमूद, तो
फिर
मूर्ति-भंजक
क्यों
कहाता?
तोड़ता
क्यों
मूर्तियाँ,
क्यों
फोड़ता
मस्तक
हमारे,
क्यों
अहिंसक
खून वह
निदोंष
लोगों का
बहाता?
युद्ध
के संहार
में, हिंसा-अहिंसा
कुछ नहीं
है,
मारना-मरना,
विजय का
मर्म
स्वाभाविक
समर का।
युद्ध में
वीणा नहीं,
रणभेरियाँ
या शंख
बजते,
युद्ध का
है कर्म
हिंसा, है
अहिंसा
धर्म घर
का।
कर रहे है
युद्ध हम
भी, लक्ष्य
है
स्वाधीनता
का,
खून का
परिचय, वतन
के
दुश्मनों
को दे रहे
हैं।
डूबते-तिरते
दिखाई दे
रहे तुम
आँसुओं
में,
खून के
तूफान में,
हम नाव
अपनी खे
रहे हैं।
मंन्त्र
है बलिदान,
जो साधन
हमारी
सिद्ध का
है,
खून का
सूरज उगा,
अभिशाप का
हम तम
हटाते।
जिस सरलता
से कटाते
लोग हैं
नाखून
अपने,
देश के हित
उस तरह, हम
शीष हैं
अपने
कटाते।
स्वाभिमानी
गर्व से
ऊँचा रहे,
मस्तक
कहाता,
जो पराजय
से झुके,
धड़ के लिए
सर बोझ
भारी।
रोष के
उत्ताप से
खोले नहीं,
वह खून
कैसा,
आदमी ही
क्या, न यदि
ललकार बन
जाती
कटारी।
इसलिए
खूनी भले
हमको कहो,
कहते रहो,
हम,
ताप अपने
खून का
ठण्डा कभी
होने न
देगे।
खून से
धोकर दिखा
देंगे
कलुष यह
दासता का,
हम किसी को
आँसुओं से
दाग यह
धोने न
देगे।
तुम
अहिंसा
भाव से सह
लो भले
अपमान माँ
का,
किन्तु हम
उस आततायी
का कलेजा
फाड़
देंगे।
दृष्टि
डालेगा
अगर कोई
हमारी
पूज्य माँ
पर ,
वक्ष में
उसके हुमक
कर तेज
खंजर गाड़
देगे।
मातृ-भू
माँ से
बड़ी है, है
दुसह
अपमान
इसका,
हैं उचित,
हम शस्त्र-बल
से शत्रु
का मस्तक
झुकाएँ।
रक्त का
शोषण
हमारा कर
रहा जो
क्रूरता
से,
खून का
बदला
करारा खून
से ही हम
चुकाएँ।
हैं
अहिंसा
आत्म-बल,
तुम आत्म-बल
से लड़ रहे
हो,
शस्त्र-बल
के साथ हम
भी आत्म-बल
अपना
लगते।
शान्ति की
लोरी सुना
कर, तुम
सुलाते
वीरता को,
क्रांति
के उद्घोष
से हम
बाहुबल को
हैं
जगाते।
आत्म-बल
होता, तभी
तो शस्त्र
अपना बल
दिखाते,
कायरों के
हाथ में
हैं
शस्त्र बस
केवल
खिलौने।
मारना-मरना
उन्हें है
खेल,
जिनमें
आत्म-बल है,
आत्म-बल
जिनमें
नहीं हैं,
अर्थियाँ
उनको
बिछौने।
और हाँ
तुमने
हमें पागल
कहा, सच ही
कहा है,
खून की हर
बूँद में
उद्दाम
पागलपन
भरा है।
हम न यौवन
में
बुढ़ापे
के कभी
हामी रहे
हैं,
छेड़ता जो
काल को, हम
में वही
यौवन भरा
है।
होश
खोकर, जोश
जो
निर्दोष
लोगों को
सताए,
पाप है वह
जोश, ऐसे
जोश में
आना बुरा
है।
यदि वतन के
दुश्मनों
का खून
पीने जोश
आए,
इस तरह के
जोश से फिर
होश में
आना बुरा
है।
बढ़ रहे
संकल्प से
हम, लक्ष्य
अपने
सामने है,
साथ है
संबल
हमारे, वतन
की
दीवानगी
का।
देश का
सौदा, नहीं
हम कोश
उनके
लूटतें
हैं।
काँपते है
नाम से, हम
होश उनके
लूटते
हैं।
हम नहीं
हम, आज हम
भूकम्प है-विस्फोट
भी हैं,
खून में
तूफान की
पागल
रवानी घुल
गई है।
आज शोले-से
भड़कते
हैं सभी
अरमान दिल
के,
आज कुछ
करके
दिखाने को
जवानी तुल
गई है।
`सरफरोशी
की तमन्ना'
से उठे हम
सरफिरे
कुछ,
मस्तकों
का मोल,
देखें कौन
है कितना
चुकाता।
देखना हैं,रक्त
किसकी देह
में गाढ़ा
अधिक है,
देखना है,
कौन किसका
गर्व
मिट्टी
में
मिलता।
हम, दमन
के दाँत
पैने
तोड़ने पर
तुल गए हैं,
वक्ष ताने
हम खड़े, यम
से नहीं
डरने चले
हैं।
खेल हम
इसको
समझते, मौत
यह हौआ
नहीं है,
मौत से भी
आज दो-दो
हाथ हम
करने चले
हैं।
जो कफन
बाँधे,
हथेली पर
रखे सर कूद
पड़ते,
मौत हो या
मौत का भी
बाप, वे
डरते नहीं
हैं।
वीर मरते
एक ही हैं
बार जीवन
में, निडर
हो,
कायरों की
भाँति सौ-सौ
बार वे
मरते नहीं
हैं।
क्या
हुआ दो-चार
या दस-बीस
हैं हम, हम
बहुत हैं
हम हजारों
और लाखों
के लिए
भारी
पडेग़े।
सिंह-शावक
एक, जैसे
चीरता दल
गीदड़ों
के
हम उसी बल
से
तुम्हारी
छातियों
पर जा
चढ़ेंगे।
दूध माँ
का, आज अपनी
आन हमको दे
रहा है,
शक्ति माँ
के दूध की
अब हम दिखा
कर ही
रहेंगे।
नाचना है
नग्न होकर,
पीट कर जो
ढोल अपना,
सभ्यता का
सबक हम
उसको
सिखाकर ही
रहेंगे।
आज यौवन
की कड़कती
धूप देती
है चुनौती,
हम किसी के
पाप की
छाया यहाँ
टिकने न
देंगे।
मस्तकों
का मोल
देकर, हम
खरीदेंगे
अमरता,
देश का
सम्मान, मर
कर भी कभी
बिकने न
देगें।
गर्जना
कर, फिर यही
संकल्प हम
दुहरा रहे
हैं,
हम, वतन की
शान को-अभिमान
को जिन्दा
रखेंगे।
देश के
उत्थान
हित,
बलिदान को
जिन्दा
रखेंगे,
खून के
तूफान
हिन्दुस्तान
को जिन्दा
रखेंगे।
और
जननायक!
भले ही तुम
हमें अपना
न समझो,
तुम भले
कोसो,
हमारे आज
बम-विस्फोट
को भी
सह रहे
आघात हम
जैसे
विदेशी
राज-मद के,
झेल लेंगे
प्राण
अपनों की
करारी चोट
को भी।
किन्तु
दुहरी मार
भी विचलित
न हमको कर
सकेगी,
चोट खाकर
और
भडकेंगी
हमारी
भावनाएँ,
और खोलेगा
हमारा खून,
मचलेगी
जवानी,
और भी
उद्दण्ड
होगी
क्रांतिकारी
योजनाएँ।
बम
हमारे,
दुश्मनों
के गर्व को
खाकर
रहेंगे,
दासता के
दुर्ग को,
विस्फोट
इनके तोड़
देगे।
और
पिस्तौलें
हमारी, गीत
गायेंगी
विजय के,
वज्र-दृढ़
संकल्प,
युग की धार
को भी मोड़
देगे।
अब
निराशा का
कुहासा पथ
न धूमिल कर
सकेगा,
क्रांति
की हर किरण,
आत्मा का
उजाला बन
गई है।
आज केवल ब म
नहीं हैं,
प्राण भी
विस्फोट
करते,
शत्रु के
संहार को,
हर साँस
ज्वाला बन
गई है।
-०००-
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