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उस दिन
उपवन में
एक वृक्ष
की डाली पर,
शुक और
सारिका
बैठे गपशप
करते थे।
चर्चित
होती थी
आसमान की
ऊँचाई,
धरती की
बातों पर
वे कभी
उतरते थे।
शुक बोला,
मेरी जैसी
चोंच कहीं
देखी?
इतनी
सुन्दर,
कवि-जन
देते हैं
उपमाएँ।
सारिका
छेड़ बैठी,
कवियों की
कौन बात-
चाहें
तिनके को
तीर सरीखा
बतलाएँ।
केवल
सुन्दर
मुख होने
से क्या
होता है,
हों कर्म
हमारे
सुन्दर, तब
सुन्दरता
है।
यदि नहीं
आत्मा में
उतनी ही
सुन्दरता,
तो तेज धूप-सा
रूप सदैव
अखरता है।
शुक बोला,
रूपसि जली-भुनी
क्यों
बैठी हो?
कवि की
वाणी से
सुरभित
सुमन
निकलते
हैं।
सारिका
तुनक बोली,
कवियों की
भली चली-
लग जाय रूप
की आँच,
तुरन्त
पिघलते
हैं।
अपमान
जाति का
हुआ देख,
शुक
खिसियाया,
बोला,
छोड़ो ये
बातें,
करें
ज्ञान-चर्चा।
थोड़ा
मुस्का कर
चुटकी भरी
सारिका ने,
क्यों लगी
सूझने अब
तुमको
पूजा-अर्चा
?
शुक और
सारिका की
यह चहक-चुहुलबाजी,
ला नहीं
सकी कोई
आकर्षक
रंग नया।
दो युवक
वृक्ष के
नीचे आकर
बैठ गए,
हो गया
उपस्थित
बिल्कुल
एक प्रसंग
नया।
सारिका
सहम
संकेतों
के स्वर
में बोली,
उड़ चलें
कहीं हम
गपशप वहाँ
लड़ाएँगे।
शुक ने
संकेत
किया, बैठो
क्यों
डरती हो?
वे हमें
पकड़ कर खा
थोड़े ही
जाएँगे।
सारिका
तनिक
झुँझलाई,
धीरे से
बोली-
मेरी मानो,
यह डाल
छोड़कर
उड़ जाएँ।
कुछ नहीं
ठिकाना इन
मर्दों की
चालों का,
क्या पता,
फाँस हमको
पिंजड़े
में
लटकाएँ।
इस मीठी
चुटकी का
रस लेकर
शुक बोला,
मर्दों पर
क्यों तुम
गुस्सा आज
उतार रहीं?
मिल गया
कौन-सा
गुरु,
जिसने
शिक्षा दी
है,
बढ़-बढ़ कर
आज
मनोविज्ञान
बखार
रहीं।
सारिका
डूबते-से
स्वर में
शुक से
बोली-
उड़ चलें
कहीं हम,
मेरा मन
चिन्तातुर
है।
कुछ अशुभ
बात होती
दिखलाई
देती है,
कुछ आशंका
से धड़क
रहा मेरा
उर है।
शुक बोला,
नारी हो
तुम, यों ही
डरती हो,
शुभ और
अशुभ की
चिन्ता
तुम्हें
सताती है।
आ जाय छींक
तो शकुन-अपशकुन
हो जाता,
तिल भर
चिन्ता को
नारी ताड़
बताती है।
कह उठी
सारिका,
प्राप्त
मुझे
वरदान एक,
क्या आगम
है, यह भान
मुझे हो
जाता है।
यदि
मँडराती
हो मौत
किसी के सर
पर तो,
उसका
यथार्थ
अनुमान
मुझे हो
जाता है।
इन दो में
से यह एक
गठीला नौ-जवान,
पड़ रही
मौत की
इसके सर पर
छाया है।
मैं सोच
रही, इसका
भवितव्य
टले कैसे,
इस अशुभ
अनागत ने
ही मुझे
सताया है।
शुक बोल
उठा, यह भेद
आज मैं
समझा हूँ,
क्यों
शंका-आशंका
से नारी मन
डरता।
अपनी
चिन्ता से
अधिक उसे
अपनों की
है,
जग-जाहिर
है नारी की
पर-दुख-कातरता।
भवितव्य
उसे तुम
साफ-साफ ही
बतला दो,
कह दो उससे,
उठकर
अन्यत्र
चला जाए।
जो
व्यक्ति
सगा बनता,
वह कभी दगा
करता,
कह दो, वह
अपनों
द्वारा
नहीं छला
जाए।
कोई सचेत
कर सके उसे,
इसके पहले-
प्रारम्भ
हुआ
युवकों
में बातों
का क्रम
था।
यद्यपि
चर्चा का
विषय गूढ़
ही दिखता
था,
बातों में
दिखता
नहीं कहीं
भी विभ्रम
था।
''सुखदेव
राज! यह देश
किधर जा
रहा आज,
इसकी
गतिविधि
कुछ नहीं
समझ में
आती है।
हम मरें-मिटें,
खप जायँ
देश-हित-चिन्तन
में,
पर जनता तो
जी भर
आनन्द
मनाती है।
उसका मत है,
इसका ठेका
कुछ लोगों
पर,
इन कामों
में क्यों
अपनी जान
फँसाएँ हम ?
जीवन पाया
है, खाएँ-पिएँ-करें
मस्ती,
यौवन पाया
है, झूमें-नाचें-गाएँ
हम।
ये युवक कि
जो भारत के
भाग्य-विधाता
है,
ये
चकाचौंध
की धाराओं
में बहते
हैं।
लेकर यौवन
की आग
माँगते ये
पानी,
ये जोर
जुल्म सब
शीश झुकाए
सहते हैं।``
सुखदेवराज
बोला, "भैया
आजाद! सुनो,
हम इनकी
गति को
मोड़ें तो
कैसे
मोड़ें।
इनसे कुछ
आशा करना,
बड़ी
दुराशा है,
इसलिए
उचित है, हम
इनका पीछा
छोड़ें।"
"मैं इससे
सहमत नहीं,
राज! जो तुम
कहते,
हम नई आग इन
युवकों
में
भड़काएँगे।
ये उठें,
प्रलय के
ताण्डव का
उद्घोष
करें,
ये उठें,
भाग्य इस
धरती का
चमाकाएँगे।
यदि किसी
देश की
दौलत का
अनुमान
करें,
संकल्पवान
यौवन केवल
उसका धन
है।
हैं युवक,
उठाते
राष्ट्र-भार
जो कंधों
पर,
युवकों से
मिलता सदा
राष्ट्र
को जीवन
है।
यदि युवक
हुए पथ-भ्रष्ट
पतन की
क्या सीमा,
ये डूब गए,
तो देश
रसातल
जाता है।
ये उछले,
इनके बल पर
देश उछलता
है,
धरती पर
जैसे
स्वर्ग
उतर कर आता
है।
इसलिए
करेंगे हम
सचेत इस
पीढ़ी को,
हम युवकों
को करना
बलिदान
सिखाएँगे।
ये सोए तो
दुर्भाग्य
हमारा
जागेगा,
हम छिड़क
खून के
छींटे
इन्हें
जगाएँगे।
इस ओर खून
की बात न हो
पाई पूरी,
उस ओर खून
के बादल
सचमुच घिर
आए।
सुखदेवराज
कब खिसका,
पता न चल
पाया,
आजाद
अकेले पर
वे बादल
अर्राए।
'तुम कौन?`
कड़क कर
पूछा
पुलिस
अधीक्षक
ने,
जब सुनी
नॉट बाबर
के मुख से
यह बोली-
आजाद, भला
यह सुनने
का कब आदी
था,
उस बोली पर
वह दाग उठा
सीधी
गोली।
वह गोली
उसकी,
शत्रु
भुजा को ले
बैठी,
ऐसा अचूक
उसका वह
सधा
निशाना
था।
यह लगा नॉट
बाबर को
कहाँ उलझ
बैठे,
आ गया काल
ही सम्मुख,
उसने जाना
था।
दूसरी ओर
विश्वेश्वर
लिए
मोर्चा था,
कुछ उझक,
वीर पर
उसने भी
गोली
छोड़ी।
आजाद,
लगाया
उसने नहले
पर दहला,
अपनी गोली
से उसकी भी
हड्डी
तोड़ी।
कर दिया
कचूमर
जबड़े का
उस गोली ने,
विश्वेश्वर
पीछे हट
झाड़ी में
दुबक गया।
इस ओर डटा
आजाद
अकेला एक
वीर,
उस ओर
सैन्य-दल
दुश्मन का
आ गया नया।
वह गरज-गरज
कहता गोरी
सेना लाओ,
क्यों
मेरे
सम्मुख
लाए तुम
हिन्दुस्तानी
?
देखो, नस-नस
में गर्म
खौलता खून
भरा,
तुम समझ
रहे शायद
इनमें
होगा
पानी।
इस भाँति
गर्जना कर
वह छोड़
रहा गोली,
पिस्तौल,
आग की
बौछारें
थी
बरसाती।
जिस ओर
छूटती
गोली,
सन्नाटा
छाता,
जिस ओर हाथ
उठता, काई-सी
फट जाती।
दुर्भाग्य,
एक ही तीर
बच रहा
तर्कश में,
उस काल-मुखी
में बची एक
अन्तिम
गोली।
पिस्तौल
लगा माथे
से घोड़ा
दबा दिया,
वह खेल गया
अपने से ही
खूनी
होली।
बन पड़ी
सैन्य-दल
की, छोड़ीं
गोलियाँ
कई,
देखी न पीठ,
उनने छाती
को भून
दिया।
जब-जब
बन्दूकों
ने छाती को
गोली दी,
तब-तब छाती
ने
क्रुद्ध
उबलता खून
दिया।
जो खटक रहे
अब तक अभाव
थे जीवन के,
हो गई
पूर्ति
उनकी, ऐसी
घड़ियाँ
आईं।
मुख रहा
तरसता
गोली खाने
बचपन में,
गोलियाँ
कई यौवन की
छाती ने
खाइंर्।
भारत माता
का लाल
विदा लेकर
उससे,
जा मिला
शहीदों की
मस्तानी
टोली में।
जिसकी
बोली
लोगों को
नवजीवन
देती,
थी छिपी
मौत उसकी
हर
क्रोधित
गोली में।
पुँछ गया
देश के
माथे का वह
रक्त-तिलक,
निर्धनता
की कुटिया
ने जिसे
लगाया था।
हो गया
शान्त घन-गर्जन
जैसा स्वर,
जिसने,
भारत के
गौरव को
झकझोर
जगाया था।
वह लाल
विदा हो
गया बावली
उस माँ का,
साँसों के
झूले पर जो
उसे
झुलाती
थी।
रखती
जिसको
पलकों की
शीतल छाया
में,
थपकी दे-दे,
छाती पर
जिसे
सुलाती
थी।
रह गई
बिलखती-रोती
वह
दुखियारी
माँ,
वह उसकी
गोदी सूनी
करके चला
गया।
अपने
हाथों से
अपना जीवन-दीप
बुझा,
जन-जाग्रति
की बुझती
मशाल वह
जला गया।
सो गया मौत
की गोदी
में वह
प्रलय-वीर,
वह मौत
नहीं, वह तो
जीवन का
अलंकरण।
चलता था
जीवन रखे
हथेली पर
जैसे,
कर लिया
मौत का भी
वैसे ही
स्वयं
वरण।
जो माँगा
था वरदान
मौत का, भर
पाया,
वह मौत
नहीं,
शाश्वत
जीवन ही
उसे मिला।
अपनी धरती
को खून
पिला कर ही
माना,
था रक्त-सरोवर
में गौरव
का कमल
खिला।
जिसको कोई
कायरता
लाँघ नहीं
पाए-
वह मौत, खून
की ऐसी
अमिट रेख-सी
है।
हम जिसे
मौत कहते,
वह उसकी
मौत नहीं,
सदियों की
छाती पर वह
शिला-लेख
सी है।
कह रही मौत
वह, चीख-चीख
कर यह हमसे,
हम जिएँ
देश-हित, और
देश के लिए
मरें।
भारत-माता
जब हमसे यह
जीवन
माँगे,
हँसते-हँसते
यह जीवन
अर्पित
उसे करें।
प्रेरणा
शहीदों से
हम अगर
नहीं
लेंगे,
आजादी
ढलती हुई
साँझ हो
जाएगी।
यदि वीरों
की पूजा हम
नहीं
करेंगे तो
यह सच मानो,
वीरता
बाँझ हो
जाएगी।
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