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आजाद,
महाभारत
का भीषण
शंखनाद,
गूँजता
सदा
युद्धोन्माद
का घोष
रहा।
उसकी
साँसों ने
देश-भक्ति
के स्वर
फूँके,
जुल्मों
के प्रति
जलता उसका
आक्रोश
रहा।
आजाद, भँवर
वन बैठा
जीवन-धारा
का,
वह कायरता
के कलुष
डुबाया
करता था।
वह जीवन का
बैताल, सजग
विक्रम
करता,
वह अनाचर
में आग
लगाया
करता था।
आजाद,
भयंकर
चक्रवात
संकल्पों
का,
वह
अन्यायों
की धूल
उड़ाया
करता था।
अत्याचारी
व्यक्तित्वों
को करने
निढाल,
उसका यौवन
रस्सियाँ
तुड़ाया
करता था।
आजाद,
क्षुब्ध
सागर का
उठता हुआ
ज्वार,
थे शासन के
जलपोत
डगमगाया
करते।
उसकी
प्रचण्डता
का कोई
प्रतिरोध
न था,
कानून, आग
ही उसकी
भड़काया
करते।
आजाद,
हिमालय
अडिग उच्च
आदर्शों
का,
वीरता सदा
उसकी
अविजित
ऊँचाई थी।
भारत-माता
के लिए काम
आऊँगा मैं,
यह गंगा
उसने
दोनों हाथ
उठाई थी।
आजाद,
वीरता के
तर्कश का
क्रुद्ध
तीर,
निर्दिष्ट
लक्ष्य का
सदा अचूक
निशाना
था।
आजादी का
अभिषेक
रक्त से
होता है,
यह मर्म,
धर्म जैसा
उसने
पहचाना
था।
आजाद,
कड़कता
हुआ
क्रुद्ध
वह घन था, जो,
अरि पर
खूनी
बिजलियाँ
गिराया
करता था।
वह
मुर्दों
में संचार
खून का
करता था,
उनमें
जीवन की
ज्योति
जगाया
करता था।
आजाद,
भावनाओं
का वह
भूकम्प
विकट,
उस धक्के
से
साम्राज्यवाद
थरथरा
उठा।
आजाद वज्र
का था ऐसा
आघात
प्रबल,
अत्याचारों
का पर्वत
भी चरमरा
उठा।
आजाद,
फूटता हुआ
भयंकर
ज्वाला-गिरि,
हम जिसे
खून कहते,
वह
क्रोधित
लावा था।
वह दानव-सा
दुर्दान्त
दस्यु भी
दहल गया,
ऐसा भीषण
उस महावीर
का धावा
था।
आजाद,
हिन्द के
बलिदानों
का स्वर्ण-लेख,
जो गर्म
खून से
गौरव-लिपि
में लिखा
गया।
भारत के
बेटे
आजादी के
पर्वाने,
यह सत्य,
सूर्य
जैसा चमका
कर दिखा
गया।
आजाद, देश
की आजादी
का वह
रहस्य,
जिसने
जाना, वह
बना देश का
दीवाना।
जो जान न
पाया, उस
कृतघ्न का
क्या कहना,
है
अर्थहीन
उसका जग
में आना-जाना।
आजाद
प्रेरणा-स्रोत
अमर हर
पीढ़ी का,
धरती की
आजादी
प्राणों
से प्यारी
हो।
यौवन
अंगारों
से अपना
शृंगार
करे,
हर फूल
वज्र, हर
कली कराल
कटारी हो।
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