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मैं
शांत, मौन,
गंभीर
भावनाओं
का स्वर,
लघु ग्राम
एक, मैं दूर
नगर
कोलाहल
से।
मैं हूँ
सागर में
सरिता का
अस्तित्व-बोध,
मैं छिटक
गया
घुँघुरू,जीवन
की पायल
से।
बालक की
जिज्ञास-माला
का एक
प्रश्न,
जिसका
उत्तर बन
जाय बड़ों
की
हैरानी।
जिसका
जैसा जी
चाहे अर्थ
लगा बैठे,
मैं
सन्तों की-अवधूतों
की अटपट
बानी।
जगमग-जगमग
विस्तीर्ण
सौर-मण्डल
का मैं,
टिमटिम
करता छोटा-सा
एक सितारा
हूँ।
मैं
भूलभुलैयों
का व्यापक
निर्देश
नहीं,
मैं
अक्लमंद
को हल्का
एक इशारा
हूँ।
मैं
उपदेशों
की
परिधिहीन
विस्तार
नहीं,
लघु सूत्र
एक, मैं
चिन्तनशील
मनस्वी
हूँ।
मैं विधि-निषेध
संयुक्त
विशद
साधना
नहीं,
पल एक सुफल
का, पहुँचे
हुए
तपस्वी
का।
मुझ में
न राज-पथ
इच्छाओं
से विशद
विपुल,
मेरी
निधियाँ
हैं,
तृप्ति-भावना-सी
गलियाँ।
विकृतियों
के स्मारक
से मुझ में
सौध नहीं,
मेरे
कच्चे घर,
गौरव की
विरुदावलियाँ।
मेरी
संस्कृति
को, चपल
सभ्यता की
दासी,
उँगलियाँ
थाम कर
चलना नहीं
सिखाती
है।
मेरे
विकास में
पौरुष का
विश्वास
सजग,
मेरी
लघुता,
गुरुता को
मार्ग
दिखाती
है।
संसद का
करते
दृश्य
उपस्थित
हैं अलाव,
मन्त्रालय
बन जातीं
मेरी
चौपालें
हैं।
कर्मठ
किसान
उत्पादन
का लड़ते
चुनाव,
मत-पत्र
बना करतीं
गेहूँ की
बालें
हैं।
मेरी
सम्पति,
बन्दिनी
नहीं
कोषालय की,
बिखरी
रहती है वह
खेतों-खलिहानों
में।
मेरी
गरिमा न
अनावृत-सी
है
नागरिका,
शोभित
होती है वह
धानी
परिधानों
से।
बचपन
चौकड़ियाँ
भरता हुआ
चला जाता,
यौवन का
चढ़ता रंग
चटखती
तीसी है।
दूल्हा-सा
सजता चना
गुलाबी
सेहरे में,
उन पर सवार
नादान उमर
पच्चीसी
है।
सर-सर
करती है
सरसों पवन-झकोरों
से,
मुख पर मल
दी, मानों
विवाह की
हल्दी है।
छेड़ती
उसे अरहर, 'गोरी
कुछ ठहर और`
प्रियतम
घर जाने की
ऐसी क्या
जल्दी है।`
रानी-सी
पुजती
ज्वार,
छत्र धारण
करके,
चम-चम मोती-से
दाने सब मन
हरते।
मक्का के
भुट्टे
चँवर लिए
तैयार
खड़े,
रजगिरा
बाजरा झुक-झुक
अभिवादन
करते।
मैं कैसे
पूरा
विवरण दूँ
निज वैभव
का,
सम्पन्न
खेत, याश-गाथा-से
फैले
रहते।
उजले रहते
लोगों के
मन दर्पण
जैसे,
श्रम-साधक
केवल हाथ-पैर
मैले
रहते।
नारियाँ
नहीं,
देवियाँ
कहें तो
अच्छा है,
सच्चे
अर्थों
में वे सब
अन्न-पूर्णाएँ।
शुभ ग्रह
जैसी, वे
गृह की
जन्म-पत्रिका
में,
वे पुरुष
हाथ में
प्रबल
भाग्य की
रेखाएँ।
उँगली की
कूँची से
घर की
दीवारों
पर,
जब करतीं
वे अनगढ़
चित्रों
की
रचनाएँ।
तो सच मानो
कृतकृत्य
कला हो
जाती है,
मिल पाती
हैं
उपयुक्त न
उनको
उपमाएँ।
तो मैं ऐसी
जीवन्त
चेतना का
प्रहरी,
लघु ग्राम
एक, पर बहुत
बड़े दिल
वाला हूँ।
मैं
संघर्षो
के पीठ तरे
हरिमाया
हूँ,
मैं गया
नहीं
नाजों-नखरों
में पाला
हूँ।
लखनवी शान,
वैसे
पड़ोस में
ही मेरे,
पर मैंने
उससे की
सदैव सीना-जोरी।
क्या नाम
बताना ही
होगा
मुझको
हुजूर!
तो सुनिए,
मुझको
कहते हैं
सब
काकोरी।
जी हाँ
काकोरी,
मैं
काकोरी
ग्राम एक,
जो
क्रान्ति-काल
में लपटों
जैसा चमक
गया।
मैंने
देखा धरती
के
दीवानों
का दल,
साम्राज्यवाद
की छाती पर
धमक गया।
मैं धीरज
से
खिलवाड़
करूँगा
नहीं अधिक,
क्या हुआ,
किस तरह
हुआ,
तुम्हें
बतलाता
हूँ।
विश्वास
सुनी
बातों पर
कम ही करता
हूँ,
आँखों
देखी ही
तुमको आज
सुनाता
हूँ।
-०००-
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