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दिनभर
ने ली दिन
की अपनी
पूँजी
समेट,
वह था
बिलकुल घर
जाने की
तैयारी
में।
रह गई शेष
थी तनिक
क्षीण आभा
उसकी,
जैसे कुछ
निधि फँस
कर रह जाए
उधारी
में।
वह रही-सही
पूँजी
डूबती
दिखाई दी,
था डूब रहा
सूरज का
लाल-लाल
गोला।
देवता
प्रचारित
करने शिला-खण्ड
गोला।
हो लेप
दिया जैसे
शुभ
सिन्दूरी
चोला।
धँस रहा
क्षितिज
में लाल-लाल
सूरज ऐसे,
लग जाए आग,
जल-पोत
समन्दर
में डूबे।
रोहित आभा
पर तिमिर
हो रहा था
हावी,
नैराश्य-ग्रसित
हो रही
दिवाकर की
ऐसे।
पंछी, दल के
दल बढ़े जा
रहे थे ऐसे
जाते हों
जैसे
श्रमिक
रात की
पाली के।
थी
क्रांति
क्षीण हो
रही
दिवाकर की
ऐसे
शोषित हों
दिन जैसे
यौवन की
लाली के।
वन से चर कर
घर के थीं
गायें लौट
रहीं,
गोधूलि
अधर में उठ
कर ऐसी छाई
थी
छू रही
किनारे दो,
जैसे कोई
धारा,
या धरती-अम्बर
की हो रही
सगाई थी।
मेरी
साँसों भी
श्लथ थीं,
दिन भर के
श्रम से,
मैंने
सोचा, अब
मैं
संध्या-वंदन
कर लूँ।
प्रेरणा
मिली जो
जीवन के
संघर्षों
से,
उनका
कृतज्ञता
से मैं
अभिनन्दन
कर लूँ।
स्वर तभी
सुनाई
दिया मुझे
कुछ छक छक
छक,
दिख पड़ी
धुएँ की
काली रेखा
भी ऐसे।
व्यक्तित्व
कुटिल जब
दिखता है,
तब दिखता
है,
अपकीर्ति
चला करती
आगे आगे
जैसे।
आ रही रेल
गाड़ी थी
कोई
इठलाती,
फक-फक छक-छक
वह बोल
बोलती थी
ऐसे
कहती हो
जैसे, सुनो!
सुनो! लखनऊ
वालो!
क्या पता
तुम्हें `जबलपूर
के छ:-छ:
पैसे।'
लखनऊ वाले
उत्तर दें,
इसके पहले
ही,
लग गई चाल
को नजर
किसी
दीवाने
की।
हक्की-बक्की
भौंचक्की-सी
वह ठिठक
गइंर्,
रफ्तार
समझ में आई
नहीं
जमाने की।
समझाने
उसको
क्रांतिवीर
कुछ कूद
पड़े,
कानों में
सिंहों की
भीषण
गर्जना
पड़ी।
हम नहीं
छुएँगे
जान-माल
जनता का, पर,
तुम हिलो
नहीं, जब तक
यह गाड़ी
रह खड़ी।
पिल तड़े
छैनियाँ-घन
ले वीर
तिजोरी पर,
तो मार-मार
हजमकर
बैठी थी वह
भारत का,
जो माल हजम
कर बैठी थी
वह भारत का,
सब छीन
लिया, उस पर
न एक कौड़ी
छोड़ी।
जो कुछ भी
पाया, सब
समेट वे
खिसक गए,
जड़ दिया
तमाचा
शासन के
मुँह पर
भारी।
तिलमिला
उठे
अंग्रेज
बहादुर
चाँटे से,
खिलखिला
उठे भारत
के वीर
क्रांतिकारी।
मैंने
देखा, वे
क्रांति-वीर
सब ही के सब,
यौवन-मद
में
मदमाते
सिंह
हठीले थे।
थे पुष्ट
वक्ष,
गर्वोन्नत
मस्तक,
सबलबाहु,
तेजीद्दीप्त,
बलशाली और
गठीले थे।
नेता तो
नेता था ही,
उसका क्या
कहना,
अंगारों स
यौवन वाला
वह
बिस्मिल
था।
आजाद
चन्द्रशेखर
भी था
उन्नीस
नहीं,
वह आत्म-बली,
संकल्पी,
निडर,
शेरदिल
था।
वैसे जब
आती उमर,
सभी होते
जवान,
कुछ और बात
थी उस पर
चढ़ी
जवानी
में।
संकल्प
धधकते थे
उसके उर
में ऐसी
लग जाए
जैसे आग
सिन्धु के
पानी में।
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