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लखनऊ
नाम, क्या
आप कहेंगे
नगर मुझे?
जी नहीं,
कृपा करके
मुझको
नगरी
कहिए।
मन ऊब गया
हो अगर
आपका जीवन
से,
तशरीफ
लाइए, आप
यहाँ आकर
रहिए।
देखेंगे
मेरा रूप, `वाह!'
कह
बैठेंगे
संभव है
चोरी-छिपे
आह भी भर
लेंगे।
सपने, जो
छलते रहे
आपको अब तक
हैं,
वे अपने
सपने आप
यहाँ सच कर
लेंगे।
इस कदर घूर
कर आप
देखते
क्यों
मुझको,
छलछला उठी
क्यों
प्यास
हृदय की
आँखों में?
परिचय
पाने को
उत्सुक
हों, तो
सुनिएगा,
मैं ऐसी
वैसी नहीं,
एक हूँ
लाखों
में।
मैं किसी
मेंढ़ पर
खिला
जंगली फूल
नहीं,
मैं
स्निग्ध
सुमन की
कोमल
मृदुल
पाँखुरी
हूँ।
मैं नहीं
सिपाही
जैसा खड़ा
तानपूरा,
ज;तद्ध अधर-शयन
करती, मैं
वही
बाँसुरी
हूँ।
मैं रूप-रंग
की नहीं
चटख भर ही
केवल,
मैं सिक्त-सुरभि
सी, जो मन को
हुलसाती
है।
मैं दूध-नहाई
हुई
चाँदनी की
फिसलन,
वह धूप
नहीं मैं,
जो तन को
झुलसाती
है।
मैं नहीं
किसी के
फूहड़
अट्टहास
जैसी,
मैं
लजवन्ती
मुस्कानों
की मृदु
सिहरन
हूँ।
मैं किसी
रूप के
प्यासे की
हूँ नजर
नहीं,
अध-खुले
नयन की
बाँकी-तिरछी
चितवन
हूँ।
अरमान
भीड़ बनकर
बौराए-से
फिरते,
अव्यक्त
खुमारी-सी
मन पर छा
जाती है।
सुरमई
किनारी की
सिन्दूरी
साड़ी में,
जब नेह-निमन्त्रण-सी
संध्या आ
जाती है।
हैं नाज और
नखरे मेरे
आभूषण, पर,
मशहूर
नहीं केवल
लखनवी
नजाकत है।
जब कभी
जुल्म की
छाया मुझ
पर पड़ती
है,
हर चितवन
ही वन जाती
खुली
बगावत है।
लावा बन
जाता खून
खौलता हुआ,
और,
विस्फोट
अनय की लघु
आहट बन
जाती है।
हर शोख अदा
करती
विद्रोह
भयानक है,
हर भाव आग,
हर साँस
लपट बन
जाती है।
यदि सुनी
आपने हो
चर्चा
सत्तावन
की,
यदि पृष्ठ
पलट कर
देखें हों
इतिहासों
के।
मेरे
विद्रोही
पैरों ने
मुँह
कुचले थे
नापाक
इरादे लिए
खून के
प्यासों
के।
तब थिरक
उठे थे
पाँव,
जवानी
नाची थी,
लहलह करते
जलते भीषण
अंगारों
पर।
धड़ से
फिरंगियों
के सर उछल-उछल
पड़ते,
जब हाथ
जवानों के
पड़ते
तलवारों
पर।
आँखों में
उतरे हुए
खून की
सुर्खी ले,
रण-खेतों
में जब
मेरे शेर
उतरते थे।
अंग्रेज
लड़ाके
बख्शो!
बख्शो!
चिल्लाते,
नापाक
इरादे
तौबा ! तौबा!
करते थे।
मैं वही
लखनऊ,
मुझमें
वही खून अब
भी,
बरजोर खून
में अब भी
वही रवानी
है।
हर बूँद
खून की, है
पागल
तूफान लिए,
हर बूँद,
जोश की
जलती हुई
निशानी
है।
हाँ, एक बात
रह गई और वह
भी कह दूँ,
अंग्रेज
हुकूमत ने
फिर मुँह
की खाई थी।
अपने आँचल
से मैंने
तेज हवा की
थी,
जब आग
क्रान्तिकारी
दल ने
भड़काई
थी।
वे मुट्ठी
भर, लेकिन
पहाड़ से
टकराए,
साम्राज्यवाद
की कैसी
शान उछाली
थी।
दुनिया के
आगे बड़ी
नाक वाले
बनते,
उस बड़ी
नाक में
उनने
कौड़ी
डाली थी।
काकोरी
कहता,
क्रांतिकारियों
ने उनकी,
गाड़ी तो
क्या,
सचमुच
इज्जत ही
लूटी थी।
जब रास
खींच कर
उसे रोक ली,
तो उनकी
छूटती
कहाँ से
गाड़ी,
नाड़ी
छूटी थी।
वह लुटी-पिटी
गाड़ी आई
रोती-रोती,
वे
क्रांति-वीर
आए इठलाते
मदमाते।
अपनी
आँखों से
मैंने
दोनों को
देखा,
वे दिन रह-रह
कर अब भी
मुझे याद
आते।
बिस्मिल,
उफ कैसा
विकट
हौसला था
उसमें,
वह जान
झोंक देने
में औरों
से बढ़कर।
अशफाक
चाँद-सूरज
का एक
नमूना था,
वह चमक उठा,
शासन की
छाती पर
चढ़कर।
रोशन,
बहादुरी
को रोशन
करने आया,
वह
अक्खड़ता
है अब न
देखने को
मिलती।
राजेन्द्र
गजब की
अलमस्ती
उसने पाई,
जो उसे
देखता, मन
की कली-कली
खिलती।
आजाद, नहीं
मिलती
उसकी कोई
मिसाल,
क्या विकट
दिलेरी और
बला की
तेजी थी।
कुछ खास
तौर से
अपने
हाथों से
गढ़कर,
वह हस्ती
मालिक ने
दुनिया
में भेजी
थी।
वह झूम-झूम
कर चलना,
उसका
इठलाना,
वह जोखिम
में उसका
आगे-आगे
रहना।
वह शान,
बहुत
मुश्किल
करना उसका
बयान,
वह वतन-परस्ती
उसकी, उसका
क्या
कहना।
अफसोस! जाल
में उलझ गए
उनमें से
कुछ,
फिर हुआ
न्याय का
नाटक, जैसे
होता है।
वे झूल गए
फन्दों पर
हँसते-हँसते
ही,
दिल करके
उनकी याद
आज भी रोता
है।
आजाद, नाम
जैसा खुद
भी आजाद
रहा,
अंग्रेज
हुकूमत छू
न सकी उसकी
छाया।
वह आँख-मिचौनी
रहा खेलता
उससे ही,
था नोच रहा
खंभा, वह
शासन
खिसियाया।
-०००-
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