ख़ुदा हाफ़िज़ फ़िल्म रिव्यू – डिज़्नी हेल्स्टार, विद्युत जामवाल, अन्नू कपूर | खुदा हाफ़िज़ फ़िल्म समीक्षा: डिज़नी हॉटस्टार, विद्युत जामवाल, अन्नू कपूर

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कहानी

कहानी

फिल्म की कहानी बिल्कुल सपाट है। एक सीधा सादा सा जोड़ा है, नौकरी का प्रलोभन है, लड़कियों की खरीद फरोख्त का आंतरिक बाजार है और इन सबके बीच एक जोड़ा है। लेकिन एक आम आदमी कैसे सुपरमैन बनकर अकेला अपने सिक्स पैक एब्स का इस्तेमाल कर अपने बीवी की है, यही फिल्म की कहानी है।

लिंगली सी पटकथा

लिंगली सी पटकथा

फिल्म की पटकथा बेहद ढीली है। हर सीन के बाद का आपसे आपको पता होगा क्योंकि आपने कहीं ना कहीं, कभी ना कभी देखा होगा। वहाँ 2 घंटे से ऊपर का रन टाइम इस पटकथा को और ढीला करता जाता है। फिल्म फारूक की कबीर का लेखन और डायलॉग्स दोनों ही दर्शकों को बांधने में नाकाम रहते हैं।

स्टारकास्ट

स्टारकास्ट

फिल्म की स्टारकास्ट अच्छी है। शिव पंडित, अहाना कुमरा, अन्नू कपूर, शिवालिका ओबेरॉय सब अपना काम बखूबी करने की कोशिश करते दिखते हैं लेकिन किसी को ढंग से उनका काम दिया ही नहीं गया है। तमीना हामिद और फैज अबू मलिक के रोल में अहाना कुमरा और शिव पंडित अरब बोली को बेहतरीन ढंग से पकड़ते हैं लेकिन फिर भी कोई असर नहीं छोड़ पाते हैं। विलेन के रोल में नवाब शाह और दोस्त के तौर पर अन्नू कपूर असर छोड़ते हैं। शिवालिका ओबेरॉय के हिस्से नरगिस के किरदार में ज्यादा कुछ नहीं है।

निर्देशन

निर्देशन

फारूक की कबीर ने फिल्म की कहानी में कुछ नई करने की कोशिश नहीं की। इस तरह की फिल्मों का ब्लूप्रिंट फोड किया और दर्शकों को परोस दिया है। लेकिन यही कारण है कि फिल्म बासी लगती है। सब कुछ कई बार कई जगह देखा गया। विद्युत जामवाल एक एक्शन 680 हैं, यूं कहिए स्टार है, आम आदमी की तरह परेशान देखने के लिए दर्शक उन्हें नहीं कर पाते हैं। और उनके इस एक्शन स्टार की छवि को ना ही फारूक ढंग से इस्तेमाल कर पाते हैं और ना ही इसे छोड़ पाते हैं। फिल्म बीच में कहीं झुलती रह जाती है।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी पक्ष

फिल्म Rogeistan में शूट हुई और इसे बेहतरीन तरीके से फिल्माया गया है। छायांकन के लिए जीतन हरमीत सिंह की प्रशंसा की होनी चाहिए जबकि संदीप फ्रांसिस की एडिटिंग फिल्म को और लंच तैयार करना है।

अभिनय

अभिनय

फिल्म में विद्युत जामवाल को अपनी एक्शन हर की सुपरमैन छवि तोड़कर एक आम आदमी बनने को कहा गया है, जिसकी उन्होंने भरपूर कोशिश की है। कई सीन में लगता है कि अब उनकी शर्ट फंटेगी है लेकिन बस वो अपनी फंसी फोड़कर, फर भींजकर रह गए हैं। ये उनके लिए मुश्किल हो रहा होगा, लेकिन समस्या यह है कि निर्देशक भी ये बात कभी याद रखते हैं कभी भूल जाते हैं।

  म्यूज़िक

म्यूज़िक

फिल्म का म्यूज़िक एवरेज है। मिथुन के म्यूज़िक पर सईद क़ादरी के बोल कुछ कम नहीं हैं लेकिन ये विशुद्ध बॉलीवुडिया गाने हैं जो अकसर चार्टबस्टर बन जाते हैं। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूज़िक भी फिल्म के हित में काम नहीं दिखता है।

कहां कमी है

कहां कमी है

फिल्म असली घटना से प्रेरित है। लेकिन कठिनाई ये है कि फिल्म को असली नहीं रहना दिया गया है। वन मैन आर्मी फिल्म को आम आदमी के ढांचे में डालकर परोसने की कोशिश की गई है जिसमें फारूक कबीर की तरह विफल दिख रहे हैं।

विद्युत जामवाल का एनेस

विद्युत जामवाल का एनेस

हां फिल्म में कुछ एक एक्शन सीन अच्छे बन जाते हैं। क्योंकि वे विद्युत जामवाल करते दिख रहे हैं। उनके एक्शन को भी आम मंगल कलाकारों से दूर रखने की पूरी कोशिश की गई है लेकिन शायद एक सुपरहीरो और आम आदमी के बीच एक एक्शन स्टार की छवि को लेकर फारूक खुद ही कन्फ्यूज़ ही रह गए हैं।

देखें या ना देखें

देखें या ना देखें

कुल मिलाकर 15 अगस्त को अगर आपके पास कुछ देखने को नहीं है तो भी यह फिल्म आपका समय अच्छा से पास कर फाउंडगी के भरोसे हम नहीं देते। एक्शन अगर आपको पसंद है तो ये फिल्म आपको निराश करती है। लेकिन विद्युत जामवाल अगर आपको पसंद करते हैं तो भी ये फिल्म आपको निराश ही करती है।