गुंजन सक्सेना द कारगिल गर्ल फिल्म रिव्यू | गुंजन सक्सेना द कारगिल गर्ल फिल्म की समीक्षा में जान्हवी कपूर ने अभिनय किया

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फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी

लखनऊ की गुंजन सक्सेना (जाह्नवी) का बचपन से ही ख्वाब होता है, पश्चिमी बनना। लेकिन शुरुआत में इसे बचपना और बाद में जिद का नाम दे दिया जाता है क्योंकि लोगों के अनुसार “लड़कियां पायलट नहीं बन सकतीं”। बड़े भाई से लेकर गुंजन की मां तक ​​उसे सपने भूल जाने की सलाह देते हैं। भाई कहता है- “बाहर की दुनिया बहुत अलग है गुंजन”।

लेकिन गुंजन के ख्वाबों का साथ देते हैं उनके रिटायर्ड कर्नल पिता (पंकज त्रिपाठी)। अपने बेटे और बेटी के बारे में कभी कोई फर्क नहीं किया। एक बात जो गुंजन की कहानी को खास बनाती है, वह उनकी सोच है। जो कभी लिंग भेद में फंस कर नहीं कर रहा। यह उनके पिता का ही प्रभाव होगा। वह बचपन से पायलट बनना चाहता था और वह बनी हुई थी। सामाजिक दायरे में कई लोगों ने उन्हें कमतर समझने की कोशिश की, कुछ ने ढ़केलने की कोशिश की पीछे। लेकिन उन्होंने सिर्फ अपने सपनों का पीछा किया .. पूरी ईमानदारी और जज्बे के साथ।

निर्देशन

निर्देशन

भारत की पहली महिला एयरफोर्स पायलट के सपने और आत्मविश्वास को स्क्रीन पर लाने में निर्देशक शरण शर्मा सफल रही हैं। उन्होंने दृश्य से ही फिल्म का एक मूड सेट कर दिया है और वह उसे हिलते नहीं है। फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि यह देशभक्ति का शोर नहीं करती, बल्कि एक अहसास देती है। यहां तक ​​की कारगिल युद्ध में जांबाजी दिखाता आई गुंजन के लिए भी कोई शोर करता बैकग्राउंड स्क नहीं डाला गया है।

वहीं, देशभक्ति के अलावा जो महत्वपूर्ण बात कहानी में गढ़ी हुई है, वह फेमिनिज्म है। मुख्य धारा से नहीं फिसलते हुए भी निर्देशक ने कहानी का मापरा बढ़ाया है। आज से 20 साल पहले समाज की रूढ़िवाद से जूझना भी किसी जंग से कम नहीं था। लेकिन लखनऊ की गुंजन इन सभी बंधनों से टूटते हुए आसमान की ऊँचाइयों में पहुंचीं। फिल्म के संवाद दमदार और समसामयिक हैं।

अभिनय

अभिनय

फिल्म मुख्य रूप से गुंजन और उनके पिता के बीच के अडिग विश्वास को दिखाती है। जाह्ववी कपूर और पंकज त्रिपाठी ने अपने किरदार के साथ पूरी तरह से न्याय किया है। दोनों विश्वास दिलाते हैं कि इस किरदार में उनसे बेहतर कोई बैठ नहीं सकता था। 24 साल की महत्वाकांक्षी गुंजन सक्सेना और परिवार के लिए गुंजू बनी जाह्नवी इस फिल्म में प्रभावित करती हैं। निर्देशक ने उनके किरदार को काफी सोच समझकर गढ़ा है। लंबे अंतराल में जाह्ववी की पकड़ छूटते छूटते रह जाती है, लेकिन गंभीर और भावुक दृश्यों में वे आसानी से उतरती हैं। गुंजन की आखों में एक चमक है, चंचलता है, लेकिन अपने घर, समाज, एयरफोर्स में रूढ़िवादवाद को लेकर एक चिढ़ और आक्रोश भी है। जाह्ववी वह दिखाने में सफल रही हैं। हिफाज़ती बड़े भाई के किरदार में अंगद बेदी और मां बनीं आयशा रज़ा भी जंचे हैं। वहीं, विंगेंडरर बने विनीत कुमार सिंह को भले ही निर्देशक ने सीमित रूप में दिया है, लेकिन वह भी प्रभावित कर रहे हैं। मानव विज भी छोटे से रोल में ध्यान केंद्रित करते हैं।

ईश्वर का पक्ष

ईश्वर का पक्ष

फिल्म का सबसे तगड़ा पक्ष इसकी पटकथा है। शरण शर्मा और निखिल मेहरोत्रा ​​द्वारा लिखित यह बॉयोपिक बेहद कसी हुई है। फिल्म महज 1 घंटे 52 मिनट की है और इतने समय में कहानी कहीं भी मुख्य भाव से भटकती नहीं है। राष्ट्रवाद को लेकर आजकल देश में यूं भी काफी तनातनी रहती है। ऐसे में यह फिल्म दिखाती है कि सच्ची देशभक्ति क्या होती है। चूंकि कहानी कारगिल युद्ध से संबंधित है, फिल्म में पायलट प्रशिक्षण, हवाई कलाबाजी, हेलीकॉप्टर द्वारा आक्रमण करने जैसे दृश्य बेहतरीन फिल्माए हैं, जिसमें शरण शर्मा की मदद की है जाने माने विदेशी एरियल कोडिनेटर मार्क वोल्फ ने कहा है। प्रभावी एडिटिंग के लिए आरिफ शेख की तारीफ होनी चाहिए।

संगीत

संगीत

फिल्म में 6 गाने हैं। संगीत कंपोज किया है अमित त्रिवेदी ने और शब्द पिरोये हैं कासर मुनेर ने। खास बात यह है कि सभी गाने फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में सहायक हैं। प्रकाश अजीज़ की आवाज़ में ‘रेखा ओ रेखा’ मजेदार ट्विस्ट की तरह है .. तो अरिजित सिंह की आवाज़ में ‘भारत की बेटी’ गौरवान्वित महसूस करती है।

लेटके या ना लेटके

लेटके या ना लेटके

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इससे बेहतरीन फिल्म रिलीज नहीं की जा सकती थी। ‘गुंजन शर्मा- द कारगिल गर्ल’ राष्ट्रगान या वंदे मातरम सुनाकर, या फहराते हुए तिरंगे को गीत नहीं .. बल्कि ईमानदारी और कर्त्तव्यनिष्ठा द्वारा देशभक्ति का ऐसा गजब एहसास जगाती है, जो आपके दिल को छू जाएगा। हमारी राय में यह फिल्म जरूर लेके, पूरी परिवार के साथ बैठकर लेके।