डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे फिल्म रिव्यू | डॉली किट्टी और वो चमके सितार फिल्म की समीक्षा भूमी पेडणेकर, कोंकणा सेन शर्मा, नेटलीक्स की फिल्म

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फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी

दरभंगा (बिहार) की दो चचेरी बहनें डॉली और काजल ग्रेटर नोएडा में रह रही हैं। डॉली (कोंकणा सेन शर्मा) अपनी शादीशुदा जिंदगी में व्यस्त है। कामकाजी पति और दो बच्चों को संभालने के अलावा, वह खुद भी नौकरी करती है, लेकिन समाज के हिसाब से वह शौक सिर्फ शौक ’के लिए है। वहीं, छोटी बहन काजल (भूमि पेडनेकर) नौकरी की तलाश में है। उसके इरादों में कितना दम था यह आपको पहले दृश्य से ही चेता दिया जाता है। जीजाजी की गलत हरकतों की वजह से काजल अपनी बहन का घर छोड़कर, होस्टल में रहता है। साथ ही उसे एक ‘रोम चैट’ कंपनी के कॉल सेंटर में नौकरी मिल जाती है। लेकिन दोनों बहनों की जिंदगी इतनी सीधी सपाट कहां?

फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी

शादीशुदा जीवन में नाखुश डॉली अपने पति (आमिर बशीर) के साथ सेक्सुअल टेंशन से गुजर रही है। “तुममें ही कमी है” जैसी चीजों को उसके पति ने इतनी बार सुना दी है कि वह उसे ही सच्चाई मानकर चली जा रही है। इधर कॉल सेंटर में काजल अब किट्टी बन गई है और रोमांटिक बेच रही है। काम के साथ साथ उसने अपने क्लाइंट प्रदीप (विक्रांत मैस्से) में प्यार तलाश लिया है। लेकिन ये सबके बीच उन्हें सही-गलत का अहसास होता चला गया है। समाज की बनी बनाई जंजीरों को तोड़कर अपनी ख्वाहिश और खुशियों को प्राथमिकता देता है दोनों बहनें अच्छी लगती हैं। एक नजरिए से यह कहानी ना पुरूषवादी है या स्त्रीवादी, यह कहानी खुद को स्वीकार करने की हिम्मत दिखाने की है।

निर्देशन

निर्देशन

“अमित जी हमसे सेक्स करना चाहते हैं”, काजल अपनी बहन से साफ साफ कहती है कि उसके पति ने उसे गलत इरादों से रोक दिया है। लेकिन डॉली बात को हंसकर टाल देती है कि वह उनके ती हिफजती बर्ताव ’को गलत समझ रही है। भारत में खुशमय विवाहशुदा जीवन के ढ़ोंग को निर्देशिका अलंकृता श्रीवास्तव ने एक बार फिर सामने लाया है। फिल्म ‘लिप्सटिक अंडर माई बुर्का’ जैसी बोल्ड फिल्म के बाद यहां भी उन्होंने स्त्रीत्व को अलग-अलग दिखाने की कोशिश की।]हालांकि एक ही कहानी में कई पहलू ढूंस देने की वजह से ध्यान भटकता है। लेकिन इतने बेहतरीन कलाकार का होना उनके लिए फायदेमंद होना है।

अच्छी बातें

अच्छी बातें

महिला सशक्तिकरण के शोर करने की बजाए यदि इस फिल्म को व्यक्तिगत स्वीकार्यता से जोड़ा जाए, तो बहुत सटीक होगा। फिल्म में फूहड़ता नहीं है। महिलावादी दिखाने के चक्कर में पुरुषों को जबरदस्ती छोटा नहीं दिखाया गया है। अलंकृता श्रीवास्तव, जो इस फिल्म की लेखिका भी हैं, ने एक बार फिर पूर्वाग्रह की जंजीरों से बंधे हुए समाज का दृढ़ता से सामना करती महिलाओं को दिखाया है।

अभिनय

अभिनय

फिल्म के कलाकार इसके मजबूत पक्ष हैं। कोंकणा सेन शर्मा और भूमि पेडनेकर अपने किरदारों में बेहद दमदार दिखी हैं। उनकी मस्ती, कंकट, रोना, हंसना, चाहना, ख्वाहिश, डर, साहस .. हर भाव दिल तक सब कुछ है। दोनों अभिनेत्रियां मजबूत दिखती हैं। उनका बेखौफपन भला लगता है। निर्देशक ने डॉली के किरदार में कोंकणा को पूरा मौका दिया है। एक पत्नी, मां, प्रेमिका, बेटी, बहन, कर्मचारी .. डॉली हर रिश्ता से जुड़ी हैं। वहीं, दोनों बहनों की जिंदगी का हिस्सा रहे .. अमोल पराशर, विक्रांत मैस्से, आमिर बशीर अपने किरदारों में पर प्रभाव दिखे हैं। जबकि करण कुंद्रा, कुराब सैत का किरदार औरसा गया सा लगता है।

ईश्वर के पक्ष में

ईश्वर के पक्ष में

आरती बजाज को बेहतरीन एडिटिंग के लिए सराहा जाना चाहिए। महज 2 घंटे में उन्होंने डॉली और किट्टी की जिंदगी के कई पहलुओं को समेटा है। फिल्म बोर नहीं करती है। हालांकि क्लाईमैक्स काफी जल्दी जल्दी में निपटाया सा लगता है।

फिल्म की पटकथा खुद निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव ने ही लिखी है। लेकिन यहाँ ठपव की थोड़ी कमी दिखती है। कहानी भावनात्मक रूप से दर्शकों को किरदारों से और भी जोड़ सकती थी। कई तरह के प्रसंग जल्दी जल्दी में छोड़ दिए गए लगते हैं, जैसे कि- डॉली का अपनी मां के साथ संबंध, डॉली के बेटे पप्पू का अपने जेंडर को लेकर स्वतंत्रता, गुंडों द्वारा योनि स्मारक को तोड़ा जाना। कसी हुई पटकथा से यह और भी प्रभावी साबित हो सकता था। फिल्म के गाने आते हैं- जाते हैं, लेकिन याद नहीं रहते।

देखें या ना देखें

देखें या ना देखें

नारीत्व के अलग अलग रंग और भूमि पेडनेकर- कोंकणा सेन शर्मा की जबरदस्त अभिनय के लिए फिल्म देखी जा सकती है। “डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे” को फिल्मीबीट की ओर से 3 स्टार।

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