दिल बेचारा फिल्म रिव्यू | सुशांत सिंह राजपूत और संजना सांघी अभिनीत दिल बेखर फिल्म समीक्षा

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फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी

कहानी में काफी कम किरदार हैं, जहां हुर और हूरिन हैं किजीजी बासु (संजना सांघी) और इम्मान दृश्यमान जूनियर उर्फ़ मैनी। दोनों एक दूसरे से बिल्कुल जुदा हैं और इनकी मुलाकात कॉलेज फेस्ट के दौरान होती है। किज्जी थाइरलॉइड कैंसर से पीड़ित है। वह मजबूत है लेकिन खुद में सिमटी रहना पसंद करती है, उसे मालूम है कि उसकी ज़िंदगी औरतों से अलग है। वहीं रजनीकांत फैन मैनी एक जिंदादिल और मसखरी पसंद लड़का है। दोनों के बीच लगातार मुलाकातें होती हैं और इस दौरान किजज़ी को मालूम पड़ता है कि मैनी कैंसर सरवाइवर रह गया है। चंद मुलाकातों के बाद ही दोनों में प्यार हो जाता है। लेकिन यह प्यार एक दूसरे के लिए जान देने वाला प्यार नहीं, बल्कि एक दूसरे की मजबूत कड़ी बनकर साथ जीवन जीने वाला है। दोनों के कुछ ख्वाब हैं, जिन्हें वह एक दूसरे के लिए पूरा करते हैं। मैनी किज़जी की ज़िंदगी में प्यार लेकर आता है, उसे खुलकर जीवन जीने का सलीका सिखाता है। जो शायद हर इंसान के लिए किसी व्यक्ति की तरह है।

अभिनय

अभिनय

मुकेश छाबरा की इस फिल्म का मजबूत पक्ष इसकी कास्टिंग है। मस्तमौला और जिंदादिल मैनी के किरदार में सुशांत सिंह राजपूत स जंचे हैं, जबकि उनके सामने जमकर टिकी हैं संजना सांघी। दोनों की कैमिस्ट्री फिल्म में बखूबी दिखाई गई है। किज्ज़ी के मां- पिता के किरदार में स्वास्तिका मुखर्जी और शाश्वत चटर्जी अच्छे लगे हुए हैं। दोनों के किरदार के प्रति सच्चे दिखे हैं। फिल्म में बंगाली परिवार दिखाया गया है, जिसमें लिहाज से निर्देशक ने बिल्कुल सटीक कास्टिंग की है। वहीं, मैनी के दोस्त के रोल में साहिल वैद ने न्याय किया है।

मुकेश छाबरा ने फिल्म में सुशांत का एक अलग अंदाज लोगों के सामने पेश किया है, जहां वो कॉमेडी, रोमांस, इमोशनल हर तरह की भावनाओं को निभाते दिखे हैं। ना सिर्फ सुशांत की आखिरी फिल्म, बल्कि सुशांत की बेहतरीन अदाकारी के लिए भी दर्शक हमेशा इस फिल्म को याद रखेंगे।

निर्देशन व टेकनिक पक्ष

निर्देशन व टेकनिक पक्ष

जॉन ग्रीन की किताब द फ्ट इन आवर स्टार्स को भारतीय दर्शकों के पसंद को ध्यान में रखते हुए पटकथा में बदला है शशांक खेतान और सुप्रोतिम सेनगुप्ता ने कहा। हालांकि किताब से फिल्म बनाने की प्रक्रिया में कहानी अपना चार्म खो देती है। कहानी में वह गहराई और भावनात्मक आर्कषण नहीं दिखता है। कमजोर पटकथा के बीच झुलती फिल्म को एआर रहमान का संगीत और बेहतरीन स्टारकास्ट रीति है। बतौर निर्देशक यह मुकेश छाबरा की पहली फिल्म है। उन्होंने पटकथा के सभी किरदारों को स्क्रीन पर अच्छा मौका दिया है। कमजोर पटकथा के बीच भी उन्होंने किजजी- मैनी और परिवार के बीच कुछ यादगार लम्हे बुने हैं। सत्यजीत पांडे की सिमेटेटोग्राफी ठीक है। जमशेदपुर और पेरिस की खूबसूरती के बीच लीड किरदारों को बेहतरीन दिखाया गया है।

संगीत

संगीत

फिल्म का संगीत.7 रहमान ने दिया है, जो सीधा दिल से कनेक्ट करता है। रचनाकार हैं अमिताभ भट्टाचार्य। रहमान की संगीत में एक खास बात है कि वह धीरे धीरे खुमार की तरह चढ़ती है, इस फिल्म के गाने भी लंबे समय तक आपके दिमाग में चलते रहेंगे। फिल्म का टाइटल ट्रैक ‘दिल बेचारा’, मसखरी, तारे गिन कानों को सुकून देता है। फिल्म के संस्करणों में कुल 8 गाने हैं।

लेटके या ना लेटके

लेटके या ना लेटके

फिल्म ना देखने का शायद सवाल ही नहीं उठता है। जीवन में काफी कम क्षण ऐसे आते हैं, जब आप सभी कुछ भूलकर भावनाओं में बह जाना चाहते हैं। ‘दिल बेचारा’ देखना वैसा ही है। यह सुशांत सिंह राजपूत के लिए एक मेमोरियल की तरह है। मैनी की तरह ज़िंदादिल सुशांत को आप दिल में रखना चाहते हैं। फिल्म की बेहतरीन स्टारकास्ट के लिए ‘दिल बेचारा’ देखी जानी चाहिए।

सुशांत की बातें

सुशांत की बातें

‘दिल बेचारा’ का मैनी कुछ कुछ सुशांत सिंह राजपूत जैसा ही लगता है। उसका दिल जीतने वाली हंसी, तेज दिमाग, स्मार्ट और बेहद इमोशनल। फिल्म देखने के साथ आंखें गीली होती है, लेकिन जैसा कि मैनी ने कहा है- ‘जन्म कब लेना है और मरना कब है, ये हम डिसाइड नहीं कर सकते .. लेकिन कैसे जीना है वो तो हम डिसाइड कर सकते हैं ..’ ये फिल्म उनके चाहने वालों को हमेशा अच्छी यादें रहती हैं।