रात फिल्म है फिल्म रिव्यू | Raat Akeli Hai फिल्म की समीक्षा में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राधिका आप्टे अभिनीत हैं

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फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी

उत्तरप्रदेश के सीनियर इंस्पेक्टर कस्टम यादव (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) के हाथों में एक हाई प्रोफाइल केस आता है। हवेली के ठाकुर की दूसरी शादी हो रही है, जब अचानक ही उनकी हत्या हो जाती है। पूरा परिवार घर में ही मौजूद रहता है, लेकिन किसी को हत्या की कोई भनक नहीं है। या शायद सभी कुछ ना कुछ छिपा रहे हैं? किसने हत्या की और क्यों, यह मामला बेहद पेचीदा है। ठाकुर के घर में एक बेटा, एक बेटी, उसके छोटे भाई की विधवा, उसके एक बेटे- बेटी, पहली पत्नी का भाई, एक नौकरानी और नई नवेली दुल्हन राधा (राधिका) है। पितृसत्तात्मकता से भरे इस परिवार में हर किसी पर एक दफा शक की सुई जाती है। लेकिन सबकी नजर टिकी होती है, राधा पर। सब उसे आरोपी मानते हैं। लेकिन इंस्पेक्टर को उस पर भरोसा है और कुछ जुड़ाव भी। कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है, एक के बाद एक नई परतें खुलती हैं और हर नई कड़ी पिछली कड़ी से जुड़ती जाती है। क्या राधा पर भरोसा करना इंस्पेक्टर जटिल यादव की सबसे बड़ी भूल साबित होगी? क्या झूठ के जाल को काटकर वह इस केस की सच्चाई तक पहुंच पाएगा?

अभिनय

अभिनय

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसके कलाकार हैं। इंस्पेक्टर जटिल यादव के किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बेहतरीन सगाई की है। उन्होंने किरदार के गुस्से, संवेदना, सनकपन और शुद्धता को निष्पक्षहीन तरीके से पेश किया है। वहीं, नवाज के सामने मजबूत टिक्स हैं राधिका आप्टे। दोनों के बीच के दृश्य और संवाद फिल्म को मजबूती देते हैं। नवाज के मां के किरदार में इला अरुण जबरदस्त शुरू कर चुके हैं। बेटे के साथ उनका रिश्ता एक हल्कापन लाता है। पूरी फिल्म एक डार्क टोन में बढ़ती है, लेकिन किरदारों की वजह से कपिल नहीं करता। तिगमांशु धूलिया, श्वेता त्रिपाठी, शिवानी रघुवंशी, आदित्य श्रीवास्तव, निशांत दहिया ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

निर्देशन

निर्देशन

मुकेश छाबरा के बाद, कास्टिंग डाइरेक्टर हनी त्रेहन ने भी बतौर निर्देशक नई शुरुआत की है। बॉलीवुड में कई मर्डर- मिस्त्री- थ्रिलर आ चुके हैं, लेकिन है रात का है ’में कुछ बातें हैं, जो इसे बाकी फिल्मों से अलग बनाती है। फिल्म अपने विषय को लेकर बेहद स्पष्ट दिखती है। लिहाजा, फिल्म देखने के दौरान डर, उत्सुकता, दवाब, छल, जड़ता .. सभी भाव सामने आते हैं। फिल्म पर निर्देशक का नियंत्रण दिखता है।

ईश्वर का पक्ष

ईश्वर का पक्ष

फिल्म की पटकथा स्मिता सिंह ने लिखी है, जिसने सेक्रेड गेम्स लिखा था। इस पक्ष में फिल्म थोड़ी ढ़ीली दिखी है। धीमी गति से चलती यह फिल्म का क्लाईमैक्स जल्दबाजी में निपटाया सा लगता है। वहीं, कहानी में प्रेम कहानी का ट्रैक बेफिजुल लगता है। श्रीकर प्रसाद की एडिटिंग भी थोड़ी और चुस्त हो सकती थी। फिल्म की लंबाई अंत तक पहुंचते पहुंचते तंग करती है। दो घंटे तक फिल्म का रोमांच बनाए रखना, मुश्किल लग रहा है। थोड़ी और कसी हुई पटकथा और कसे हुए किरदार .. फिल्म को काफी बेहतर बना सकते थे।

क्या अच्छा, क्या बुरा

क्या अच्छा, क्या बुरा

फिल्म घूमकेतु के बाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी को इस रंग- ढ़ंग में देखना तसल्ली देता है। फिल्म के संवाद, सिमेटोग्राफी, ड्रामा इसके मजबूत पक्ष हैं। वहीं, फिल्म का एकमात्र नकारात्मक पहलू इसकी लंबाई है, जिसे अच्छी खासी एडिटिंग की जरूरत थी।

  लेटके या ना लेटके

लेटके या ना लेटके

‘रात मेला है’ आपको ँ घंटे तक बांधे रखता है, अंतर्मन करता है। लेकिन लंबे समय तक प्रभाव नहीं छोड़ा जाएगा। यदि आप बॉलीवुड संस्पेंस- ड्रामा पसंद करते हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी। फिल्मीबीट की ओर से ‘रात का खाना है’ को 3 स्टार।