सड़क 2 फिल्म रिव्यू – डिज़्नी हेल्स्टार, आलिया भट्ट, संजय दत्त | सदाक 2 फिल्म की समीक्षा हॉटस्टार आलिया भट्ट, संजय दत्त, महेश भट्ट पर आधारित है

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कहानी

कहानी

फिल्म की कहानी शुरू होती है आलिया के संशोधित लेने से। आर्या (आलिया भट्ट) अपनी मौसी जो अब उसकी सौतेली माँ है, उसे लेने वाली निकली है। क्योंकि मौसी ने दौलत की लालच में अपने बाबा के साथ मिलकर उसकी मां का खून किया है। साथ ही पिता को भी अंधा भक्त बना दिया है। इसके साथ आर्य को पागल करार दे दिया गया है जिससे उसकी बात का कोई विश्वास नहीं होगा। लेकिन आलिया इस पूरे धर्म गुरू और बाबा के धंधे से लड़ने के लिए सोशल मीडिया पर अपनी एक अरमी तैयार करती है। लेकिन क्या इस आर्मी में वास्तव में इतनी दम है कि वह आर्या ने उसे ले पाया। ये फिल्म की कहानी कतई नहीं है।

कहानी है

कहानी है

क्योंकि फिल्म की कहानी आर्या के राव (संजय दत्त) से मिलने के बाद बदल जाती है। रवि, ​​जिसकी मरहूम पत्नी पूजा (पूजा भट्ट) ने उसकी कंपनी की अंतिम बुकिंग आर्या के नाम की थी। आर्या और रवि एक साथ एक यात्रा पर निकलते हैं जिसका मकसद होता है आर्य का बाबाओं का पर्दाफाश करना और अंधविश्वास। लेकिन जब ये सड़क खत्म होने मंज़िल पर पहुंचती है तो फिल्म एक परिवार के एकता कपूर सीरियल की कहानी हो जाती है। जहाँ कुछ साज़िशें हैं, कुछ राज़ हैं और कुछ नक़ाब हैं।

किरदार

किरदार

फिल्म में आलिया भट्ट को संजय दत्त में वह पिता दिखता है जो उन्हें नहीं मिला। और आलिया भट्ट में संजय दत्त को वो बेटी दिखती है जिसे गोद लेने उनकी पत्नी, साथ वापस ज़िंदा नहीं लौटा पाया गया है।) दोनों के बीच ये पिता और बेटी की केमिस्ट्री अच्छी बन पड़ी है और दोनों इसे निभाने की पूरी कोशिश करते दिखते हैं। लेकिन अगर कोई उनका साथ नहीं देता तो वह फिल्म में महेश भट्ट और सुहृता सेनगुप्ता का स्क्रीनप्ले करती है।

अभिनय

अभिनय

फिल्म के मुख्य किरदार दो ही हैं – आर्या (आलिया भट्ट) और रवि (संजय दत्त)। दिलचस्प यह है कि दोनों ही मनोयोगी हैं। और दोनों ने ही अपने किरदारों को बखूबी निभाने की पूरी कोशिश की है। लेकिन कुछ सीन में जहां संजय दत्त किरदार को कुछ ज़्यादा ही पकड़ते दिख जाते हैं वहीं आलिया अपने किरदार को छोड़ती नज़र आ रहे हैं।

किरदार को मनाना

किरदार को मनाना

आदित्य रॉय कपूर के हिस्से जो काम आया है, उसे वो जैसा कर सकते थे, वैसा उन्होंने किया है। एक मौका किरदार होने के बावजूद, वह फिल्म में कहीं भी अपनी छाप छोड़ते नहीं दिखते हैं। मकरंद देशपांडे के हिस्से फिल्म का मुख्य प्लॉट धर्मगुरू और ढोंगी बाबा आया था लेकिन उनके किरदार को ग्राफ इतना ढीला है कि प्रभाव छोड़ने की कोई गुंजाइश नहीं थी। इस कमज़ोर कहानी में अगर कोई धुंधला सा सितारा है तो वो हैं जीशू सेनगुप्ता जो अपने किरदार को बेहतरीन ढंग से प्लेते दिखते हैं। प्रियंका बोस के हिस्से ज्यादा सीन नहीं है लेकिन वो भी अपनी छाप छोड़ती हैं।

डायरेक्शन

डायरेक्शन

फिल्म को एक सीक्वल साबित करने के लिए बेतरतीब तरीके से सड़क से जोड़ने की कोशिश की गई है। इसके लिए सड़क के फ्लैशबैक सीन फिल्म में इतने इस्तेमाल किए गए हैं कि आप ऊबने लगेंगे। पूजा भट्ट फिल्म में केवल अपनी पहली फिल्म के दृश्यों में मौजूद हैं। फिल्म एक सफर की कहानी थी लेकिन इस यात्रा में ऐसा कुछ भी नहीं है जो याद रखा जा सके। महेश भट्ट की इस ढीली सी कहानी को अगर कोई कभी पकड़ पाता है तो वह है स्टार्स का प्रदर्शन।

तकनीकी पक्ष

तकनीकी पक्ष

फिल्म सड़क और रास्तों की कहानी है लेकिन जय पटेल का छायांकन आपको इस यात्रा पर साथ जाने को मजबूर नहीं करता है। संदीप कुरूप की एडिटिंग शायद इस फिल्म को बचा पाती पर ऐसा हो नहीं पाया है। खासतौर से कुछ सीन ऐसे थे जिनकी बिना फिल्म शायद अच्छी बनती थी। सुब्रत चक्रवर्ती और अमित रे का प्रोडक्शन डिज़ाइन भी आपको बाबाओं की दुनिया में नहीं ले जा पाता है। प्रियंका भट्ट के कॉस्ट्यूम भी बाबा में वो जान नहीं फूंक पाते हैं कि वो भगवान लग पाएं। कुल मिलाकर एक अच्छी कहानी को एक कमज़ोर टीम विफल करती दिखती है।

म्यूज़िक

म्यूज़िक

भट्ट कैंप की फिल्मों की खासियत है गाने। फिल्म के गाने एल्बम में सुनने पर ठीक लग सकते हैं लेकिन फिल्म में ये गाने कोई प्रभाव नहीं छोड़ते। ना ही पटकथा में कोई मदद करते हैं। वहीं बैकग्राउंड म्यूज़िक भी फिल्म की कोई मदद नहीं करता है। जबकि फिल्म की म्यूज़िक टीम में संदीप चौटा, जीत गांगुली, प्रशांत पिल्लई, अंकित तिवारी जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

क्या अच्छा है

क्या अच्छा है

फिल्म एक अच्छी शुरुआत करती है और एक अच्छी फिल्म का प्रोमो भी करती है। संजय दत्त और आलिया भट्ट के बीच के कुछ सीन अच्छे बन जाते हैं। वहीं इंटरवल के पहले फिल्म आपको उलझाए रखने में कामयाब होती है। फिल्म के सभी ट्विस्ट आपको एक अच्छी कहानी की ओर बढ़ाकर ले जाते हैं।

कहाँ किया

कहाँ किया

मध्य फिल्म के बाद भी फिल्म में कुछ होता है नहीं दिखता है। बस ढेर सारे ट्विस्ट और हर ट्विस्ट के साथ फिल्म का विलेन मोड़ है जो कुछ समय बाद आपको तंग करने लगेगा। क्लाईमैक्स पर पहुंचकर पूरी फिल्म कार्ड के पत्तों के महल की तरह ढेर हो जाती है। और इतनी निराशा आपको कभी किसी फिल्म से नहीं हुई होगी।

देखें या ना देखें

देखें या ना देखें

यह फिल्म उच्च दुकान फीकाप्रेस है। आपको विंडो खरीदारी करते समय सब कुछ अच्छा लगेगा लेकिन ट्रायल रूम में आप बसंत के साथ निकल जाएंगे। इसलिए हमारी मानिए तो आप इस फिल्म को आराम से छोड़ सकते हैं। कुछ मिस नहीं होगा जीवन में। हमारी ओर से फिल्म को 1.5 स्टार।

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